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जून 2024

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प्रसंगवंश

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की 150वीं जयंती को अब केवल छह बरस बाकी हैं। हिन्दी के आरम्भिक प्रगतिशील लेखकों में से एक ‘क़लम के इस सिपाही’ को संसार से गए हुए भी लगभग 88 वर्ष होने को आए, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी उतनी प्रासंगिक लगती हैं जितनी वे अपनी रचना के काल में थीं अथवा 80, 70, 60 या फिर 50 बरस पूर्व प्रतीत होती थीं।

प्रमुख आलेख

प्रेमचन्द और फ़िल्मी अनुभव

लेखक : कमल किशोर गोयनका

प्रेमचन्द के फ़िल्मी अनुभवों का संसार मुश्किल से एक वर्ष का है। फ़िल्म में जाने का उनका कोई इरादा नहीं था, लेकिन ‘हंस’ और ‘जागरण’ की आर्थिक हानि ने उन पर बम्बई (अब मुम्बई) जाने का दबाव डाला और उन्होंने अपने पत्रों में भी इसे स्वीकार किया कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी ग़लती थी। प्रेमचन्द मुम्बई पहुँचकर अजन्ता सिनेटोन कम्पनी में कहानी-संवाद लेखक का कार्यभार सम्भालते हैं और अपनी पत्नी शिवरानी देवी को पत्र में लिखते हैं, “अभी मैं नहीं कह सकता कि मैं यहाँ रह भी सकूँगा या नहीं। जगह बहुत अच्छी है, साफ़-सुथरी सड़कें, हवादार मकान लेकिन जी नहीं लगता। जैसी कहानियाँ मैं लिखता हूँ उन्हें निभाने के लिए यहाँ कोई ऐक्ट्रेस ही नहीं है। मेरी एक कहानी यहाँ सबको अच्छी लगी लेकिन यहाँ की ऐक्ट्रेसें उसे निभा नहीं सकतीं। उसे निभाने के लिए कोई पढ़ी-लिखी ऐक्ट्रेस रखनी पड़ेगी। मैं तो ऐसी ही कहानियाँ लिखूँगा। इन लोगों की इच्छानुसार तो लिख नहीं सकता।” और उसी दिन जैनेन्द्र को भी लिखा, “पहली को आ गया। मकान ले लिया। यहाँ दुनिया दूसरी है, यहाँ की कसौटी दूसरी है। अभी तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ।” और फिर 24 जून, 1934 को पत्नी को इस सम्बन्ध में अपने विचार लिखे, “यह एक बिलकुल नई दुनिया है। साहित्य से इसका कम सरोकार है। इन्हें तो रोमांचकारी सनसनीख़ेज़ तस्वीरें चाहिए। अपनी व्याप्ति को ख़तरे में डाले बग़ैर मैं जितनी दूर तक डायरेक्टरों की इच्छा पूरी कर सकूँगा, उतनी दूर तक करूँगा, मुझे करना पड़ेगा। ज़िन्दगी में समझौता करना ही पड़ता है। आदर्शवाद महँगी चीज़ है और बाज़-औक़ात उसको दबाना पड़ता है।” प्रेमचन्द की कहानी 'मज़दूर' पर फ़िल्म बनती है, पर सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। अमृत राय ने ‘प्रेमचन्द : कलम का सिपाही’ में ‘मज़दूर’ फ़िल्म की विस्तार से जानकारी दी है। अमृतराय लिखते हैं, “'गोदान' पर काम चल रहा था, मगर चींटी की चाल से। उधर 'मज़दूर' बनना शुरू हो गई थी। जैसाकि ज़ियाउद्दीन बर्नी साहब कहते हैं, जो उन दिनों बम्बई में ही थे और मुंशीजी से अक्सर मिलते रहते थे, और जिसकी तसदीक़ उस फ़िल्म के निर्देशक मोहन भवनानी ने भी की, 'इस फ़िल्म की कहानी का ढाँचा कम्पनी ने तैयार किया था और उस पर चमड़ी-गोश्त मुंशीजी साहब ने मढ़ दिया था।’” यह एक अतिनाटकीय-सी कहानी थी जिसका उद्देश्य यह दर्शाना था कि पूँजीपति उदार और उन्नत विचारों का होकर देश का, जनता का कितना भला कर सकता है! बात थोड़ी-सी मुंशीजी के मन की थी भी और बहुत कुछ नहीं भी थी। बहरहाल ढाँचा तो यहाँ पहले से तैयार ही था, बस गोश्त चढ़ाना बाक़ी था और उसमें मुंशीजी ने कोताही नहीं की। डायलाॅग में जितनी जान डाल सकते थे, डाली, जितनी तेज़ी ला सकते थे, लाए। भवनानी ने भी, जिनकी फ़िल्मी ज़िन्दगी शुरू ही हो रही थी, ख़ूब जी तोड़कर काम किया, एक मिल-मालिक दोस्त की कपड़ा मिल में तस्वीर 'शूट' की गई। बम्बई की फ़िल्मी दुनिया में 'लोकेशन शूटिंग' आज भी कम ही देखने में आती है। रुपये में पन्द्रह आना तस्वीरें आज भी पूरी की पूरी नक़ली सेट बनाकर स्टूडियो में ही बना ली जाती हैं, उस व़क्त तो हिन्दी फ़िल्मों के उस आरम्भिक युग में यह एक बिलकुल नई और अनहोनी बात थी। लिहाज़ा मिल के हज़ारों मज़दूरों समेत वह सीन पर बहुत ही सजीव उतरे, और गो कहानी काफ़ी लचर-सी थी, डायलाॅग ने उसमें काफ़ी जान फूँक दी थी। तस्वीर जब सेंसर बोर्ड के सामने पहुँची तो बम्बई के बड़े पूँजीपति और मिल-ओनर्स एसोसिएशन के सभापति सर जीजीभाई ने, जो बोर्ड के भी सदस्य थे और बहुत प्रभावशाली सदस्य थे, डटकर उसका विरोध किया और फ़िल्म सेंसर बोर्ड से पास नहीं हो सकी। तब भवनानी और अजन्ता सिनेटोन के दूसरे लोगों ने बोर्ड के सभापति और बम्बई के पुलिस कमिश्नर किन्हीं मिस्टर विलसन से अपील की। मिस्टर विलसन ने कुछ दृश्य काट देने के लिए कहा। कम्पनी ने उनकी सलाह पर अमल किया, लेकिन तब भी बम्बई के सेंसर बोर्ड ने, जिसमें बहुत-से बड़े-बड़े पूँजीपति भरे थे, फ़िल्म को पास नहीं किया, लेकिन पंजाब में सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म को पास कर दिया और लाहौर के इम्पीरियल सिनेमा में राम-राम करके उसके दिखाने जाने की बारी आई। बम्बई के सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म को पास नहीं किया, यह बात फैल ही चुकी थी। पहले ही रोज़, भवनानी साहब का कहना है, “साठ हज़ार मज़दूरों की भीड़ सिनेमा के फाटक पर जमा हुई और सात रोज़ तक कुछ इसी तरह का हाल रहा, फाटक पर भीड़ की रोक-थाम के लिए पुलिस और मिलिटरी का बन्दोबस्त करना पड़ा। आख़िरकार पंजाब सरकार ने भी घबराकर उस पर रोक लगा दी।” लाहौर के बाद वह फ़िल्म दिल्ली में रिलीज़ हुई। वहाँ भी अनिष्टकारी ग्रहों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। कोई मज़दूर फ़िल्म के एक सीन की ही तरह, किसी मिल-मालिक की मोटर के आगे लेट गया और एक अच्छा-ख़ासा हँगामा खड़ा हो गया। नतीजा, दिल्ली की प्रान्तीय सरकार ने भी उस पर रोक लगा दी। यू.पी., सी.पी. में जहाँ-तहाँ यह तस्वीर दिखाई गई पर कुछ अरसे के बाद जब अंग्रेज़ी हुकूमत ने उस पर रोक लगा दी तो बात ख़त्म हो गई। बाद को सन् 37 में एक बार फिर उसके मामले को उभारा गया और किसी प्रकार उसके और भी कुछ हिंसात्मक दृश्य काट-छाँट करके उसके ऊपर लगी हुई रोक हटाने का उपाय किया गया लेकिन तब तक लोहा ठंडा पड़ चुका था और लोग दिलचस्पी खो चुके थे, मगर फ़िल्म को दूसरी नज़र से देखने वाले लोग भी थे और उसकी बहुत अच्छी रिव्यू अमरीका की मशहूर पत्रिका 'एशिया' में निकली, लेकिन यह तो ज़रा अभी आगे की बात है। अभी तो तस्वीर बन रही है।” इस फ़िल्म में प्रेमचन्द ने एक-दो मिनट के लिए सरपंच का अभिनय भी किया, बिना मेकअप के और अपनी ही वेशभूषा में। ज़ियाउद्दीन बरनी उन दिनों मुम्बई में ही थे। उन्होंने 'मज़दूर' फ़िल्म के बारे में लिखा है- “13 नवम्बर को मुंशीजी ने हैदराबाद के हुसामउद्दीन ग़ौरी साह्य के एक फ़िल्म-सम्बन्धी लेख पर, जिसमें उन्होंने जन-रुचि के संस्कार के लिए फ़िल्म की उपयोगिता की बात उठाई थी, लेखक को बधाई देते हुए कहा, “मुझे आपके ़ख्याल से लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ इत्तेफ़ाक़ है। मगर जिन हाथों में फ़िल्म की क़िस्मत है वह बदक़िस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। इंडस्ट्री को ‘मज़ाक’ और इसलाह से क्या निस्बत? वह तो एक्सप्लायट करना जानती है और यहाँ इंसान के मुक़द्दसतरीन (पवित्रतम) जज़्बात को एक्सप्लायट कर रही है। बरहना (नग्न) और नीमबरहना (अर्द्ध नग्न) तस्वीरें, क़त्ल-ओ-ख़ून और जन की वारदातें, मार-पीट, ग़ुस्सा और राजव और नफ़्सानियत ही इस इंडस्ट्री के औज़ार हैं और इन्हीं से वह इंसानियत का ख़ून कर रही है।” इसी प्रकार प्रेमचन्द 26 दिसम्बर, 1934 को इन्द्रनाथ मदान को लिखते हैं कि सिनेमा साहित्यिक आदमी के लिए ठीक जगह नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि आर्थिक रूप से स्वतन्त्र हो सकने की कुछ सम्भावनाएँ इसमें दिखाई देती थीं, लेकिन अब मैं देख रहा हूँ कि यह मेरा भ्रम था और अब मैं फिर साहित्य की ओर लौट रहा हूँ। सच तो यह है कि मैंने लिखना कभी बन्द नहीं किया। मैं उसे अपने जीवन का लक्ष्य समझता हूँ।” इसके पन्द्रह रोज़ बाद फिर जैनेन्द्र को पत्र में लिखा, “फ़िल्मी हाल क्या लिखूँ। ‘मिल’ यहाँ पास न हुआ। लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है। मैं जिन इरादों से आया था उनमें एक भी पूरा होता नज़र नहीं आता। ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियाँ बनाते आए हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते। वल्गैरिटी को ये लोग ‘एण्टरटेनमेंट वैल्यू’ कहते हैं। राजा-रानी, उनके मन्त्रियों की नक़ली लड़ाई, यही उनके मुख्य साधन हैं। मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे, लेकिन उनको फ़िल्म करते इन लोगों को सन्देह होता है कि चले या न चले। यह साल तो पूरा करना है ही। क़र्ज़दार हो गया था, क़र्ज़ा पटा दूँगा, मगर और कोई लाभ नहीं। उपन्यास के अन्तिम पृष्ठ लिखने बाक़ी हैं, उधर मन ही नहीं जाता। यहाँ से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर जा बैठूँ। वहाँ धन नहीं है मगर सन्तोष अवश्य है। यहाँ तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूँ।” उन्होंने इन्हीं विचारों के कारण डायरेक्टर हिमांशु राय का उनकी कम्पनी में नौकरी करने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। फ़िल्मी जीवन से उनका मन उचट गया था। जैनेन्द्र ने दिल्ली में 'मज़दूर' फ़िल्म देखी तो प्रेमचन्द से उसकी कमज़ोरियों की शिकायत करते हैं तो वे उत्तर में जैनेन्द्र को लिखते हैं, “‘पगमज़दूर' तुम्हें पसन्द न आया। यह मैं जानता था। मैं इसे अपना कह भी सकता हूँ, नहीं भी कह सकता। इसके बाद एक रोमांस जा रहा है। वह भी मेरा नहीं है। मैं उसमें बहुत थोड़ा-सा हूँ। 'मज़दूर' में भी मैं थोड़ा-सा हूँ, नहीं के बराबर। फ़िल्म में डायरेक्टर सब कुछ है। लेखक क़लम का बादशाह क्यों न हो, यहाँ डायरेक्टर की अमलदारी है और उसके राज्य में उसकी (लेखक की) हुकूमत नहीं चल सकती। हुकूमत माने तभी वह रह सकता है। वह यह कहने का साहस नहीं रखता, मैं जनरुचि को जानता हूँ। इसके विरुद्ध डायरेक्टर ज़ोर से कहता है, मैं जानता हूँ, जनता क्या चाहती है, और हम जनता की इसलाह करने नहीं आए हैं। हमने व्यवसाय खोला है, धन कमाना हमारी ग़रज़ है। जो चीज़ जनता माँगेगी, वह हम देंगे। इसका जवाब यही है- अच्छा साहब, हमारा सलाम लीजिए। हम घर जाते हैं। वहीं मैं कर रहा हूँ। मई के अंत में बन्दा काशी में उपन्यास लिख रहा होगा। और कुछ मुझमें नई कला न सीख सकने की भी सिफ़त है। फ़िल्म में मेरे मन को सन्तोष नहीं मिला। सन्तोष डायरेक्टरों को भी नहीं मिलता, लेकिन वे और कुछ नहीं कर सकते, झख मारकर पड़े हुए हैं। मैं और कुछ कर सकता हूँ, चाहे वह बेगार ही क्यों न हो, इसलिए चला जा रहा हूँ। मैं जो प्लाॅट सोचता हूँ उसमें आदर्शवाद घुस आता है और कहा जाता है उसमें एण्टरटेनमेंट वैल्यू नहीं होता। इसे मैं स्वीकार करता हूँ।... मेरे लिए अपनी वही पुरानी लाइन मज़े की है, जो चाहा लिखा……।” प्रेमचन्द अजन्ता सिनेटोन से अपने अनुबंध से तीन महीने पहले ही मुम्बई छोड़कर चल देते हैं एक कटु अनुभव के साथ कि फ़िल्म बनाना व्यापार है और धन कमाना ही उद्देश्य है। इसके लिए डायरेक्टर जनता की अभिरुचि का नहीं, बल्कि मनोरंजन के नाम पर पवित्र भावनाओं का नहीं, वह अधिक-से-अधिक नग्नता दिखाता है। पश्चिम की सारी बुराइयाँ हमारे अंदर दाख़िल की जा रही हैं और जनता बेबस है। जनता में न संगठन है और न भले-बुरे का विवेक और विज्ञान जैसा ईश्वरीय वरदान भी अयोग्य लोगों के साथ में है, इसलिए प्रेमचन्द इस दायरे से निकलकर अपने बनारस (अब वाराणसी) में जीवन गुज़ारना उचित और उपयुक्त समझते हैं और वे मुम्बई छोड़कर बनारस चले जाते हैं। (प्रेमचन्द का लेख : ‘फ़िल्म और साहित्य’) प्रेमचन्द ने मुम्बई से बनारस लौटकर 'लेखक' में फ़िल्म और साहित्य पर लेख लिखा था। इसकी प्रतिक्रिया हुई और नरोत्तम प्रसाद ने अपनी प्रतिक्रिया ' लेखक' को भेजी और यह पत्र प्रेमचन्द को मिला और उन्होंने 'फ़िल्म और साहित्य' नाम का बड़ा लेख लिखा– प्रेमचन्द जैनेन्द्र के आग्रह पर दिल्ली आते थे और उनके प्रस्ताव पर वे आर्यसमाजी नेता प्रो. इन्द्र तथा जैनेन्द्र के साथ 'शैलबाला' फ़िल्म देखने गए और अपने अनुभव पर यह लेख लिखा जो 'जागरण', 12 अक्तूबर, 1932 को प्रकाशित हुआ। इस प्रकार यह प्रेमचन्द के फ़िल्मी जीवन की संक्षिप्त कहानी है। वे आर्थिक दबाव के कारण अजन्ता सिनेटोन कम्पनी के एक वर्ष के अनुबंध पर मुम्बई जाते हैं और तीन महीने पहले कम्पनी बन्द हो जाने के कारण वाराणसी लौट आते हैं। वे फ़िल्म के लिए कहानी और संवाद लिखते हैं, फ़िल्म में अभिनय करते हैं, हिन्दी फ़िल्मों को देखकर तथा मुम्बई में काम करके फ़िल्म का चरित्र खोलते हैं। फ़िल्म देखते हैं और उसकी आलोचना करते हैं। हिन्दी फ़िल्मों से इतने विविध रूप में प्रेमचन्द जुड़ते हैं और वे इस दृष्टि से अकेले हिन्दी लेखक हैं।

विशिष्ट/फोकस/विशेष आलेख

अपनी धुन में रहता आया एक शख़्स

लेखक : अर्पण कुमार

श्रीपत राय पर चर्चा करते हुए अकलंक मेहता की कुछ कहानियों पर बात करना ज़रूरी हैं। सम्भवतः यह बेहतर शुरुआत हो। श्रीपत राय ने कुछ कहानियाँ अकलंक मेहता के नाम से लिखीं। उनकी कहानियों में समाज के गहरे अवलोकन के कई अनुभवपगे दृश्य सामने आते हैं। वे अपने पाठकों और कथा-पात्रों की पृष्ठभूमियों में उभरते विभेद के उस गूमड़ को भी दिखलाते हैं, जो शिक्षा और विकास के समान अवसर न मिलने से बड़ा और बदसूरत होता चला गया। ऐसा करते हुए वे सुविधाभोगी और कुछ हद तक मतलबपरस्त उन बुद्धिजीवियों की ख़बर लेना भी नहीं भूलते, जो अन्यथा समाज की बेहतरी के कई संकल्पों से लबरेज़ दिखाई पड़ते हैं, अपने वक्तव्यों और आलेखों में बड़े-बड़े संकल्प करते मिलते हैं, मगर समाज में पसरी विद्रूपता की टेढ़ी-मेढ़ी, प्रकट-ओझल आकृतियों और उनके धब्बों से कमोबेश अनजान होते हैं। कहानियों की डोर पकड़े श्रीपतजी कई बार समाज के इन धड़ों के बीच आवाजाही करते हैं। उनके ज़्यादातर पाठक, मध्यवर्गीय-शिक्षित परिवारों से आते हैं। उनकी कहानियों में निम्न मध्यवर्गीय और हाशिए के जीवन के उदासी और कशमकश से भरे कई प्रसंग पूरी प्रामाणिकता के साथ सामने आते हैं। श्रीपत राय अपनी कथा-भाषा के लिए कुछ नए या अपारम्परिक शब्द भी गढ़ते चलते हैं। मसलन, ‘थामना’ शब्द का इस्तेमाल क्रिया के रूप में होता है, मगर इससे संज्ञा बनाकर वे ‘थाम’ (‘झगड़ा, सुलह और फिर झगड़ा’ कहानी में) का प्रयोग करते हैं। ऐसे कुछ और शब्दों को प्रचलन में लाने की कोशिश उनके यहाँ दिखती है। वे अपनी कहानियों में बेमेल और बहुविवाह के अभ्यस्त ग़रीब मज़दूरों या अत्यल्पता में जीवन जी रहे नौकरीपेशा लोगों की समस्याओं को उठाते हैं। मगर, उनके प्रति सहानुभूति की किसी आरोपित लहर की जगह वे उनके साथ सच्चे प्यार और समानता के व्यवहार के पैरोकार हैं। पात्रों को उनके आलस्य के लिए लताड़ने का हक़ भी उन्हें उनकी इसी स्नेह-तत्पर आत्मा से मिलता है। किसी के लिए ऐसा करना समाज से गहरे और अनपेक्षित जुड़ाव से ही सम्भव है। शब्दों से खिलन्दड़े अंदाज़ में निपटते हुए श्रीपतजी हमें कई बार चौंकाते हैं। स्वयं को हीन समझते हुए प्रेम की तड़प के साथ जीते उनके पात्र, जीवन और उसके बाद भी हमसे जैसे संवादरत रहना चाहते हों। कड़वे या प्रदूषित यथार्थ के कई असहज दृश्य भी वे अपनी कहानियों में लाते हैं। चुभती/तल्ख़ या आक्रामक लगती भाषा का भी वे प्रयोग करते हैं। जब मनुष्य पशुवत् रहने को विवश हो जाए, तब उसकी परिस्थिति का चित्रण ऐसी ही खरी भाषा में सम्भव है, जहाँ निःसंकोच होकर उस गरिमाहीनता को उकेरा जा सके, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को परेशान कर सकती है। उनका उद्देश्य किसी का अनादर करना नहीं, बल्कि तमाम असुविधाजनक और पशुओं से भी बुरी हालत में गुज़र-बसर करती मनुष्यता के उस वातावरण को निष्पक्ष और निरपेक्ष ढंग से शब्दों में ढालना है, जो है तो शहरी और सभ्य सभ्यताओं के पार्श्व में ही, मगर किसी रौशनी से महरूम वह अपनी ही अँधेरी और खुरदुरी गलियों में क़ैद रहने को अभिशप्त है। श्रीपत राय, बतौर कथाकार किसी सहानुभूति से काम नहीं लेते, तलछट को ढँपा नहीं छोड़ते, बल्कि उसे सभी के समक्ष ले आते हैं। श्रीपत राय की कहानियों में हिन्दुस्तानी भाषा का वैभव है। उनके यहाँ हिन्दी और उर्दू, मैना और गौरैया की तरह एक-दूसरे के आस-पास फुदकती नज़र आती हैं। ‘जाँगरचोर’, ‘मूँडीकाटी’ जैसे शब्द उनके पात्र आपस में एक-दूसरे के प्रति ग़ुस्सा और उसी व़क़्त स्नेह दिखाते हुए बोलते हैं। ‘नीमजान’, ‘फ़हश’ जैसे शब्द उनकी कहानियों में अक्सर हाँ प्रयुक्त होते हैं। निरंकुश और बेपरवाह गृहस्थी में उपेक्षित रहती किशोरियों की उस स्थिति से निकलने की चाहत जैसे कोई निरी कल्पना साबित होती है। कम उम्र में वे किसी और के खूँटे से बाँध दी जाती हैं, जहाँ ससुराल में एक-दूसरा मकड़जाल उनका स्वागत करने को उद्यत रहता है। वे और उलझती चली जाती हैं। कुपोषण, बीमारी और तंगहाली के बीच बच्चे को जन्म देती हैं और उन्हें पालती हुई अनथक संघर्षों से दो-चार होती हैं- स्त्री के ऐसे कई दोहरे-तिहरे संघर्ष श्रीपत राय की कहानियों में बख़ूबी आते हैं। ऐसे में कोई संक्षिप्त, मधुर-प्रेमिल याद किसी सूखते कुएँ के तल में मिलते पानी के चहबच्चे-सी होती है, जिसके सहारे जीवन का तपता रेगिस्तान पार कर लेने की कोई जुगत दिखती है। उनकी ऐसी कहानियाँ पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं, जहाँ अन्यथा अलक्षित रह जानेवाली नामालूम-सी कोई तरलता स्मृति का स्थायी नागरिक बन जाती है। ‘झगड़ा, सुलह और फिर झगड़ा’ शीर्षक अपनी कहानी में श्रीपतजी शहर के बीच बसी मेहतरों की बस्ती की कथा एक दम्पती के माध्यम से कहते हैं। उस बस्ती को लेकर शहराती मध्यवर्ग की मनोवैज्ञानिक धारणाएँ भी बेपर्दा होती हैं। नाज़िया और कल्लू की गृहस्थी के उठते-गिरते प्रसंगों के बीच कथा आगे बढ़ती है, जहाँ सभ्य माने जाते लोगों का पोलापन भी सामने आता है। उनकी कहानी ‘घृणा’ के पात्र सँवरी, भोला और मँगरू जैसे चरित्र हैं, जिनके लिए लेखक पहले आगाह कर देता है कि उनके प्रति अगर कोई घृणा पनपती है तो उसमें लेखक का कोई दोष नहीं होगा। कथा कहने का यह भी एक अंदाज़ हुआ। घनघोर ग़रीबी, असुरक्षित और कुपोषण से भरी प्रसूति-स्थितियों, बहु-विवाह के बीच अग्रसर होते बचपन को लेखक बड़े तटस्थ भाव से रखता चलता है। श्रीपत राय के कथा-संसार में ऐसे कितने पुरुष हैं, जो अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ विवाह करते हैं! अत्यल्प साधनों में जिजीविषा की संजीवनी का कमाल भी उनके यहाँ द्रष्टव्य है। उनकी कहानियों में व्यंग्य का टोन है और वहाँ व्यक्ति के आलस्य पर चुटकी भी ली गई है। श्रीपत राय के लिए जीवन-राग का कोई भी रंग अस्पृश्य नहीं था। अभाव की परिस्थितियों में दानवाकार दिखते जीवन की आपाधापी में मूलभूत आवश्यकताओं और चन्द स्नेहिल फुहारों के लिए तरसते मानव-जीवन की बेचारगी और कोशिश- उनकी कहानियों का सिग्नेचर ट्यून बनती है। शहरी मध्यवर्ग की सीमाओं और लालसाओं को पहचानते श्रीपत राय अपनी कहानियों में समाज के निम्न तबक़ों से जुड़े लोगों की कथा सुनाते हैं। हाशिए के जीवन की कथा कहते हुए वे कई प्रयोग करते चलते हैं और अपने पाठकों को उन समस्याओं से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील दिखते हैं। ‘नरक’ कहानी की मुख्य किरदार पद्मिनी के माध्यम से वे जो कुछ कहलवाते हैं, वह किसी लम्बी आह से कम नहीं, “अगर यह दुनिया न सुधरी तो अगली तो सुधार लूँ। अब समझती हूँ कि सुधारना हो तो आदमी वही दुनिया सुधार ले, अगली को सुधारना महज़ ख़ामख़ियाली है।” अपनी इस कहानी का सार भी वे पद्मिनी के माध्यम से रखते चलते हैं- “उसके बाद मैं यहाँ लाई गई और अब यहीं रहूँगी। क़िस्से को बहुत मुख़्तसर में रख देती हूँ : ग़रीब और उससे भी ज़्यादा लावारिस बचपन : जवानी, एक मधुर चुम्बन और विवाह, दो बच्चे, तपेदिक, मौत। मौत के व़क्त उम्र 21 वर्ष।” ‘वासन्ती’ कहानी में वे जिस तरह वासन्ती का स्केच खींचते हैं, उनकी क़लम का कौशल वहाँ मुखर है। त्रिलोचन शास्त्री का यह मानना कितना समीचीन है, “श्रीपत की कहानी की शैली आधुनिक थी। भावुकतापूर्ण अंश उनकी कहानियों में नहीं मिलते।” बल्लभ डोभाल के संस्मरण के मुताबिक़, श्रीपत राय ने कुल पाँच कहानियाँ लिखीं। बल्लभजी ने कभी श्रीपतजी से आगे कहानी न लिखने का कारण जानना चाहा था। उन्होंने बल्लभजी को एक रात की घटना सुनाई थी, “उन दिनों मैं बनारस में था। इलाहाबाद, बनारस तब साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था। साहित्यकार सभी अपने परिचित थे। बनारस आते तो हफ़्ते-महीनों वहीं पड़े रहते। उन्हीं दिनों एक बार जैनेन्द्रजी वहाँ आ पहुँचे। दिनभर बातें हुईं। रात को खाना खाकर मैं तो सो गया, लेकिन जैनेन्द्र रातभर बैठे रहे। सुबह जाकर मालूम हुआ कि वे कहानी लिखते रहे। बहुत अच्छी कहानी लिखी थी। मैंने सोचा, जब यह आदमी एक रात में इतनी अच्छी कहानी लिख लेता है तो इसी को लिखने दो। वैसा लिखना मेरे बस का था भी नहीं। जैनेन्द्र ने मेरा हौसला पस्त कर दिया और मैंने कहानी लिखना ही छोड़ दिया।” ‘कितनी दूर जाना होता है पिता से / पिता जैसा होने के लिए!” (‘चीनी चाय पीते हुए’ कविता में अज्ञेय) गोरखपुर में गाँधीजी के भाषण से प्रभावित होकर जब प्रेमचन्द अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ते हैं, तब उसके बाद वे अपने प्रिय लेखन-कर्म के अतिरिक्त कुछ अन्य काम भी करते हैं। ‘हंस’ पत्रिका का सम्पादन और सरस्वती प्रेस का संचालन करते हैं। कुछ समय बम्बई रहकर लौटते हैं। ज़्यादातर कामों में उनकी रचनात्मकता और संलिप्तता दिखती है, मगर आर्थिक स्तर पर वे उनके संघर्ष भरे दिन भी रहे। प्रेमचन्द से साहित्यिक समझ की सघनता और भौतिक साधनों की अत्यल्पता दोनों उनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीपत राय को विरासत में मिली। कथा-सम्राट जिस ‘हंस’ को छोड़ जा चुके थे, उसके प्रकाशन-सम्पादन का काम श्रीपत राय ने आगे बढ़ाया। श्रीपतजी ज़ोर से और देर तक हँसते थे। उस समय उनके चेहरे पर निर्दोषता का सूरजमुखी खिल उठता था और उनकी आँखों में कोई चमकदार झील उतर आती थी। वह हँसी भी उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली। यह बात उन्हें अपने छोटे भाई अमृत राय से भी क़रीब लाती थी। अपनी संस्मरण पुस्तक ‘Raw Umber’ में लेखक-अनुवादक सारा राय लिखती हैं, “मेरे चाचा अमृत राय दिल्ली आते तो हमारे घर रुकते। दोनों भाइयों की केवल एक चीज़ मिलती थी- उनकी हँसी। चाचा नीचे वाली मंज़िल पर ठहरते और मेरे पिता का ठिकाना ऊपर था। कभी संयोग से दोनों एक ही समय पर हँसते, तो लगता कि पूरी इमारत उनके ठहाकों से हिल उठी है।” बनारस में प्रेमचन्द 56 वर्ष की उम्र में जब अन्तिम साँस लेते हैं, श्रीपत राय तब 20 और अमृत राय (बन्नू-1921, कानपुर-1996, इलाहाबाद) 15 वर्ष के थे। प्रेमचन्द की लिखी किताबों के जो अधिकार दूसरे प्रकाशकों के पास थे, अभी-अभी स्नातक हुए श्रीपत राय ने उनसे वे सभी अधिकार वापस ख़रीदे। ज़मीनी स्तर पर जाकर पुस्तकों की बिक्री शुरू की और प्रेस के कामों में ज़रूरी बारीकियों को समझा। पुस्तकें देश से बाहर भी पहुँचाई गईं। श्रीपत राय ने क्रमशः आर्थिक समृद्धि हासिल की। 18 अक्तूबर 1948 को श्रीपत राय की शादी कथाकार और शास्त्रीय गायिका ज़हरा राय से हुई, जो शिया-मुस्लिम पृष्ठभूमि से थीं। श्रीपत राय के चित्रकार को उन्होंने अपने तईं कुछ उकसाया भी। अपने पिता के उस दौर को सारा राय इन शब्दों में रूपायित करती हैं, “1956 से उन्होंने चित्र बनाना शुरू कर दिया था। उन दिनों मेरी माँ मिट्टी के गुलदान रंगा करती थीं। उन पर चटकीले रंगों के फूल या महीन लताएँ, गुल-बूटे बनातीं। मेरे पिता ने चित्रकला की तरफ़ अपने रुझान को शायद वहीं से पहचाना हो? कभी वे हम बच्चों को आर्ट में मिला स्कूल का होमवर्क ख़ुद करने बैठ जाते। अन्य कामों से फ़ुर्सत पाकर और इतवार को वह दीवार के सहारे कैनवस टिकाकर, अलसी, तारपीन और तेल रंगों के ग़ुबार में खो जाते। एक के बाद एक चित्र बनाते जाने का जुनून उन पर हावी हो जाता। सैकड़ों तस्वीरें उन्होंने लगभग बीस साल के अंतराल में बनाईं, जो कि चीड़ की लकड़ी से बने स्टैंड पर या दीवार के सहारे टिकी घर के कमरों में रखी रहतीं। उन्हीं दिनों से उनकी मुलाक़ात और दोस्ती रामकुमार, हुसैन, रज़ा, तैयब मेहता, रिचर्ड बार्थोलोम्यू इत्यादि से हुई। 1963 में टोक्यो के बिएनाले में उनकी तस्वीरें गईं। दिल्ली के अशोक होटल में प्रदर्शनी हुई। हो सकता है कि चित्रकला जगत से जुड़ने के लिए ही उन्होंने पूरी तरह से दिल्ली शिफ़्ट हो जाने का फ़ैसला किया हो। 1964 से उनका दिल्ली आना-जाना बढ़ गया था। 1970-72 में जब मेरी बहन का और मेरा कॉलेज में दाख़िला हुआ तो वह दिल्ली में बस चुके थे।” कई लेखक-कला-समीक्षक श्रीपत राय की चित्रकला के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में लिखते रहे हैं। चित्रों पर लिखे उनके आलेखों की चर्चा होती रही। जब वे स्वयं चित्र बनाने में डूबे तब कहानी जगत और उसकी गहमागहमी से कुछ दूर भी हुए। वही कहानी, जो कभी उनकी धड़कन होती थी। दिल्ली आने पर मक़बूल फ़िदा हुसेन और रामकुमार जैसे चित्रकारों से उनकी मित्रता गहरी हुई। उन्होंने यद्यपि काफ़ी देर से पेंटिग शुरू की मगर इस क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी एक विशेष पहचान बनाई। इस तरह मुख्यतः बनारस, इलाहाबाद और दिल्ली- उनके कर्मक्षेत्र रहे। आर-7, हौज़ख़ास का मकान- जिसे उन्होंने ख़रीदा और बाद में बेचा, कई लेखकों-कलाकारों के संस्मरणों में केन्द्रीय स्थान रखता है। वहाँ पीढ़ियों के लेखकों-कलाकारों का अड्डा जमा। बाद में वे कुछ समय नवजीवन विहार में रहे और फिर सफ़दरजंग एंक्लेव में। दिल्ली का वासी अब दिल्ली का किराएदार हो गया था। बाद में वे इलाहाबाद चले गए, जहाँ उन्होंने अन्तिम साँस ली। दिल्ली में लगी श्रीपत राय की चित्र-प्रदर्शनी से जुड़े अपने भावों को लेखक-अनुवादक रघुवीर सहाय अपनी डायरी में बड़े मनोयोग से दर्ज करते हैं। डायरी-पुस्तक ‘दिल्ली मेरा परदेस’ में संकलित दिनांक 16 अक्तूबर, 1960 की अपनी टीप में रघुवीर सहाय बड़ी दिलचस्प और मानीख़ेज़ टिप्पणी करते हैं, “…लगता है, वह अपने प्रौढ़ मानस के एक आनन्दमय पक्ष का थोड़ा परिचय अपने चित्रों में देना चाहते हैं और यहाँ तक वह पूर्ण रूप से सफल हैं। जहाँ तक उनकी निजी अनुभूति का प्रश्न है, ‘दो बहनें’ और ‘म्यूराबाद का गिरिजाघर’ जैसे चित्र दिखाते हैं कि उसमें कभी उनके ख़ुद के लिए और महत्व आना बाक़ी है पर अन्यत्र श्रीपत राय एक ऐसे चित्रकार हैं, जिनकी कृतियों के साथ आप एक ही कमरे में रह सकते हैं। उनके चित्रों की आत्मीयता का एक दूसरा पहलू यह है कि उनके अपने घर में लगे हुए वे और अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं जैसे चित्रकार की उपस्थिति उनका आनुषंगिक हो। जिन्होंने इलाहाबाद में भी इन चित्रों को देखा है, इससे सहमत होंगे।” बिन्दु अग्रवाल भी श्रीपतजी पर लिखे अपने संस्मरण में उनकी पेंटिंग्स की विस्तार से चर्चा करती हैं। श्रीपत राय ने अपनी सन्तानों के बीच संघर्ष और पैसे की बचत को हमेशा एक बड़े मूल्य की तरह रखा। बच्चों की फ़िज़ूलख़र्ची को यथासम्भव नियन्त्रित किया तो ज़रूरतमन्द कई लेखकों-कलाकारों और अन्य लोगों की गाहे-ब-गाहे आगे बढ़कर मदद भी की। इसी कारण से किसी के यह पूछने पर कि तुम बड़े होकर क्या बनना चाहती हो, उनकी छोटी बेटी सारा राय ग़रीब होना बतलाती थीं। ऐसा इसलिए कि वे अपने बचपन से ही प्रेमचन्द और अपने पिता-चाचा के संघर्षपूर्ण दिनों को जानती-सुनती आई थीं और ग़रीबी उन्हें कोई बड़ी शय नज़र आती थी। अंदाज़ लगाया जा सकता है कि श्रीपत राय, अपने बच्चों में उस मूल्य को ठीक-ठीक रोपित करने में सफल हो पाए, जहाँ रचनात्मकता के प्रति आग्रह किसी ठस्स आर्थिकी सुरक्षा से बीस ठहरता है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्रीपत राय ने एक साथ कई क्षेत्रों में अपने हाथ आज़माए और कुछेक क्षेत्रों में अच्छी ऊँचाई हासिल की। फिर कुछ ऐसा भी होता रहा कि वे उस क्षेत्र को एकदम से छोड़ कुछ और करने लगते थे। एक समय ऐसा था कि वे जिस सरस्वती प्रेस को चलाते थे, उसके दफ़्तर बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, पटना समेत कुछ और शहरों में खुलते चले गए। किसी काम को एक मक़ाम पर लाकर छोड़ना जैसे श्रीपत राय का कोई विशेष स्वभाव हो। सारा राय उन्हें ‘ख़ानाबदोश सर्जनात्मक आवेग’ (Nomadic creative impulses) वाले इंसान के रूप में देखती हैं और श्रीपतजी ही क्यों, दुनिया के कई लेखकों-कलाकारों पर यह बात लागू होती है। शायर ख़ुमार बाराबंकवी का यह शे’र याद आता है– ‘मेरे रहबर मुझको गुमराह कर दे सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है।’ दोनों विश्वयुद्धों (प्रथम, 1914-18 और द्वितीय, 1939-45) का श्रीपत राय के जीवन से सम्बन्ध है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान वर्ष 1916 में वे गोरखपुर मंा पैदा हुए। प्रेमचन्द के गुज़रने के बाद ‘कहानी’ पत्रिका की शुरुआत वे वर्ष 1937 में करते हैं और द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले ही वर्ष यानी 1939 में काग़ज़ का दाम काफ़ी बढ़ जाने से उन्हें ‘मन मारकर’ उसे बन्द करना पड़ता है मगर, असमय बुझी वह लौ उनके भीतर बराबर जलती रही। परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1953 में वे पुनः ‘कहानी’ पत्रिका आरम्भ करते हैं, जिसे 1979 तक चलाते हैं। ‘कहानी की बात’ पुस्तक की भूमिका (‘आत्मनिवेदन’) में वे लिखते हैं, “1979 में ‘कहानी’ के सम्पादन का बड़ा बोझ मेरी सीमित शक्ति से परे हो गया और मैंने यही उचित समझा कि उसे बन्द कर दूँ क्योंकि उसका स्तर और महत्व मैं कम नहीं कर सकता था। वह निर्णय मुझे आज भी उचित प्रतीत होता है।” ‘कहानी’ में लिखे जाने वाले उनके सम्पादकीय के मुरीद बहुतेरे थे। ‘हंस’ का प्रकाशन सन् 1930 में बनारस से आरम्भ हुआ था। तब से लेकर 1936 तक प्रेमचन्द उसके सम्पादक रहे। उनके निधन के बाद ‘हंस’ के सम्पादकों में जैनेन्द्र, शिवरानी देवी, शिवदान सिंह चौहान, श्रीपत राय, अमृत राय आदि रहे। प्रेमचन्द के समय से ही ‘हंस’ ने अपनी आधुनिक चेतना की धार बनाए रखी। अपने आलेख ‘MODERNISMS IN THE MAGAZINE : A Case for Recovery in Hindi’ में आकृति मांधवानी ‘हंस’ पत्रिका की उस आधुनिकता-एप्रोच को उठाती हैं, जो अपने समय से आगे जाकर सोच रही थी और ऐसी रचनाओं को जगह दे रही थी। वे अपने आलेख में, विडम्बनाओं को उसकी पूरी कटुता के साथ उकेरने वाले कथाकार और आधुनिक हिन्दी एकांकीकार भुवनेश्वर की रचनाओं की विशेष रूप से चर्चा करती हैं। दिसम्बर 1933 अंक में प्रेमचन्द, भुवनेश्वर की पहली एकांकी ‘श्यामा : एक वैवाहिक विडम्बना’ छाप चुके थे। श्रीपत राय के समय ‘हंस’ के अप्रैल 1937 अंक में भुवनेश्वर की चर्चित कहानी ‘भेड़िए’ छपी। भुवनेश्वर की इन रचनाओं से सन्दर्भ लेती हुई आकृति मांधवानी ‘हंस’ के साहस और सच के साथ खड़े होने की बात उठाती हैं। प्रेमचन्द की मृत्यु के बाद सरस्वती प्रेस, बनारस की ओर से श्रीपत राय ‘हंस’ पत्रिका निकालते रहे। श्रीपतजी के समय उस पत्रिका की टैग-लाइन होती थी-‘अंतर्प्रान्तीय साहित्यिक प्रगति का अग्रदूत’। इंटरनेट पर ‘हंस’ के जनवरी 1942 अंक का पीडीएफ़ उपलब्ध है। श्रीपत राय ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों को इसके सलाहकार सम्पादक मंडल में शामिल किया। श्रीपत राय पर लिखे अपने संस्मरण में विष्णु प्रभाकर ‘हंस’ की स्तरीयता, एकांकी और संस्मरण जैसी विधाओं के लिए उसके योगदान की बात उठाते हुए कहते हैं, “‘हंस’ और ‘कहानी’- इन दो पत्रिकाओं ने हिन्दी को जाने-माने लेखक ही नहीं दिए बल्कि अनेक विधाओं को भी पुनर्जीवित किया। ‘हंस’ के अनेक विशेषांक प्रेमचन्द के समय में निकले थे और कालांतर में मील का पत्थर बन गए। उनके बाद श्रीपत के कार्यकाल में कम-से-कम दो विशेषांक तो ऐसे निकले, जिन्होंने हिन्दी-साहित्य को नई दिशा दी। जब हिन्दी में एकांकी नाटक लिखने की प्रथा नहीं पनप पा रही थी, केवल सर्वश्री राम कुमार वर्मा, भुवनेश्वर, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि कुछ ही ऐसे लेखक थे जो इस विधा में लिख रहे थे, लेकिन उसे गम्भीरता से लेने वाले बहुत कम लोग थे। ऐसे में ‘हंस’ ने हिन्दी एकांकी को लेकर एक विशेषांक निकाला। उसमें इस विधा को लेकर जहाँ कई नए नाटक प्रकाशित हुए, वहीं उसकी उपयोगिता को लेकर एक लम्बी बहस भी शुरू हो गई। उसके बाद हिन्दी संसार में देखते-देखते एकांकी नाटकों का लेखन और प्रकाशन शुरू हो गया। इसी प्रकार हिन्दी साहित्य में रेखाचित्र लेखन के लिए कोई विशेष स्थान नहीं था। संस्मरण लेखन को भी लेखक गम्भीरता से नहीं लेते थे। इसके विपरीत, गुजराती आदि दूसरी भाषाओं में उत्कृष्ट रेखाचित्र लिखे जा रहे थे। तब अपनी परम्परा के अनुरूप ‘हंस’ ने सन् 1940 में रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित किया और इस विधा ने भी शीघ्र ही अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर ली। उन दिनों गद्य-गीत लिखने की भी प्रथा थी। ‘हंस’ में अनेक सुन्दर गद्य-गीत प्रकाशित हुए।” ‘हंस’ के विभिन्न स्तम्भों की चर्चा गाहे-ब-गाहे होती रही है। रामकृष्ण अपनी पुस्तक ‘सिने संसार और पत्रकारिता’ में स्पष्टतः मानते हैं, “पुस्तक-समीक्षाओं से सम्बन्धित ‘नीरक्षीर’ नामक उसका स्तम्भ मुझे विशेष रूप से आकृष्ट करता था और उसे पढ़कर मैंने कितनी पुस्तकें ख़रीद डाली होंगी, इसका अनुमान करना आज भी मेरे लिए सहज-सम्भव नहीं। श्रीपत राय के साथ मेरा आत्मीय नैकट्य तो बहुत बाद में हुआ, लेकिन उनकी सम्पादन-कला का मुरीद मैं बचपन से था।” सरस्वती प्रेस से ही श्रीपत राय ने कुछ समय तक ‘उपन्यास’, ‘साहित्यालोचन’ जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया। विष्णुचन्द्र शर्मा और प्रयाग शुक्ल अपने संस्मरणों में ‘उपन्यास’ के अंकों की चर्चा करते हैं। ‘उपन्यास’ के पहले अंक में कृष्ण बलदेव वैद का उपन्यास आया था। उस पत्रिका में कुछ विदेशी उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद भी छपे। हरदयाल अपने संस्मरण में ‘साहित्यालोचन’ से अपने जुड़ाव की बात करते हुए बताते हैं, “प्रियदर्शी प्रकाश उसमें सहायक सम्पादक थे। उनके आग्रह पर उसमें मैंने शिकागो समीक्षकों पर एक लेख लिखा और निर्मल वर्मा के कहानी-संग्रह ‘बीच बहस में’ तथा उनके द्वारा अनूदित ‘एमेके : एक गाथा’ की समीक्षा लिखी।” बाद में राजेन्द्र यादव के सम्पादन में अगस्त 1986 से ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन हुआ। वर्तमान में संजय सहाय इसके सम्पादक हैं। श्रीपत राय ने अपने समय में एक प्रकाशन योजना ‘गल्प संसार माला’ की शुरुआत की थी। इसमें पहले विभिन्न भारतीय भाषाओं से और बाद में विदेशी भाषाओं से चयनित कहानियों के अनुवाद छापे जाने थे। यह योजना उनकी सोच के मुताबिक बेशक आगे नहीं बढ़ पाई, मगर इसके अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। इसमें बाँग्ला और तमिल के साथ-साथ कुछ अन्य भाषाओं से हिन्दी में अनूदित कहानियाँ छपीं। इसके तमिल भाग का पीडीएफ़ संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध है। ‘कहानी’ पत्रिका के सम्पादक के रूप में श्रीपत राय का कार्य ऐतिहासिक महत्व का है। उसमें अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, राम कुमार, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, रमेशचन्द्र शाह, ज्योत्स्ना मिलन आदि की कई शुरुआती रचनाएँ छपीं। इस ‘कहानी’ पत्रिका के सम्पादन से कई नामचीन लेखक जुड़े रहे, जिनमें भैरव प्रसाद गुप्त आदि शामिल हैं। सरस्वती प्रेस की किताबों ने एक विशेष क़िस्म की सेंसबिलिटी भी तैयार की। महत्वपूर्ण द्विमासिक पत्रिका ‘प्रतीक’ के सम्पादन मंडल में सियारामशरण गुप्त, नगेन्द्र, अज्ञेय के साथ श्रीपत राय भी रहे। यह पत्रिका 14, हैस्टिंग्स रोड (न्याय मार्ग), इलाहाबाद से निकलती थी। वह जगह उन दिनों लेखकों का जमावड़ा होती थी, जिसका किराया श्रीपत राय देते थे। विष्णुचन्द्र शर्मा अपने संस्मरण में इसकी चर्चा करते हैं। ‘Raw Umber’ में सारा राय बताती हैं कि कैसे वह जगह राइटर्स कम्यून की तरह काम करती थी। वहाँ एक समय अज्ञेय, आशा मुकुल दास, नेमीचन्द्र जैन आदि रहा करते थे और कई लेखकों का आना-जाना होता था। श्रीपत राय, अज्ञेय के मित्र और प्रकाशक रहे। उनका ‘शेखर : एक जीवनी’ उपन्यास सबसे पहले सरस्वती प्रेस से ही आया। कथाकार और कवयित्री ममता कालिया श्रीपत राय के इन दोनों उपक्रमों को अपनी पुस्तक ‘जीते जी इलाहाबाद’ में इस तरह शब्दबद्ध करती हैं, “‘प्रतीक’ द्वैमासिक पत्र का सम्पादन एक सम्मिलित प्रयास था जिसमें नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल और अज्ञेय की साधना लगी थी। साधन जुटाए प्रेमचन्द के बड़े पुत्र श्रीपत राय ने जिन्होंने अरसे बाद ‘कहानी’ पत्रिका का सम्पादन व प्रकाशन कर हिन्दी कहानी को शीर्ष पर पहुँचा दिया। यही पत्रिका ‘नई कहानी’ आंदोलन की रीढ़ बनी। श्रीपतजी ने शुरू तो यह सन् 1937 में की लेकिन दूसरे महायुद्ध के छिड़ने पर काग़ज़ की क़ीमतों में इतना उछाल आ गया कि इसे बन्द करना पड़ा।” भारत भारद्वाज भी यह स्पष्ट मानते हैं कि “‘वस्तुतः ‘कहानी’ से ही ‘नई कहानी’ की शुरुआत हुई।” वे याद करते हैं कि ‘नामवर सिंह द्वारा हिन्दी कहानी की समीक्षा की शुरुआत ‘आज की हिन्दी कहानी’ शीर्षक जिस लेख से हुई थी, वह लेख ‘कहानी’ के नववर्षांक 1957 अंक में ही छपा था। इसमें उन्होंने सवाल उठाया था नई कविता की तरह ‘नई कहानी’ नाम की भी कोई चीज़ है क्या?” ‘कहानी’ पत्रिका के कई विशेषांक आए, जो ख़ूब सराहे गए। निश्चय ही इसने नई कहानी आंदोलन की रीढ़ रखी। इस आंदोलन के प्रमुख आधार-स्तम्भों में एक कमलेश्वर स्वीकारते हैं, “श्रीपत राय ने नए लेखकों, कथाकारों के लिए कहानी का मंच तैयार किया था और नए को आत्मसात् कर नई कहानी आंदोलन को जन्म दिया था। वे स्वयं आंदोलनकारी नहीं थे परन्तु निरन्तर आंदोलित रहना ही उनकी आदत थी।...श्रीपतजी कहानी के केन्द्र पुरुष नहीं थे, पर वे लगभग दशकों तक कहानी के केन्द्र में थे। कहानी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने कहानी के ऐसे नए प्रतिमान स्थापित कर दिए थे, जिसके आधार पर नई कहानी और उसकी आलोचना पद्धति का आविष्कार हुआ था।” श्रीपत राय के सम्पादक के लिए नए लेखकों को बेहतर ढंग से प्रकाशित और प्रमोट करने की बात कई लोग स्वीकारते हैं। साथ ही, उन्होंने बड़ी संख्या में लेखकों को पत्र लिखे। अलग-अलग लेखकों के संकलनों में वे पत्र पढ़े जा सकते हैं। आज ज़रूरत है कि उनके लिखे और उन्हें मिले पत्रों (जितना प्राप्त हो सके) का एक संकलन तैयार किया जाए। गुज़रने से पहले वे स्वयं अलग-अलग मौक़ों पर प्राप्त पत्रों को फाड़ते चले गए, मगर उनके घर में सम्भवतः अभी भी कुछ पत्र बचे हों। यह एक श्रमसाध्य कार्य होगा, मगर इससे उस युग की साहित्यिक गतिविधियों का मंज़र कुछ अधिक स्पष्टता से सामने आ सकेगा। ‘एक पते पर’ और ‘आवाहयामि’ जैसी पुस्तकों में रमेशचन्द्र शाह को लिखे श्रीपत राय के कुछ पत्र संकलित हैं। उन पत्रों में श्रीपतजी के व्यक्तित्व की गरमाहट महसूस की जा सकती है। भाषा भी उसी के अनुरूप वहाँ अपना आकार लेती चलती है। बदलती परिस्थितियों के साथ स्वयं के ढीले पड़ते चले जाने का वे एक-दो वाक्यों में हवाला देते चलते हैं। अपने मनोभावों पर चुटकी लेते दिखाई पड़ते हैं। वे ‘अनिश्चित जीवन का स्वाद’ (रमेशचन्द्र शाह को लिखे पत्र में श्रीपत राय दिनांक – 01/09/1975) भी लेते हैं। प्रकटतः कम बोलने वाले श्रीपत अपने पत्रों में दूसरों को चिन्ताओं से मुक्त रहने की राय देते हैं तो असमंजस से घिरे अपने हृदय को भी खोलते हैं। प्रकाशक-सम्पादक होने के नाते उनके लिए हर समय मीठा बने रहना सम्भव नहीं था। कई बार उम्र के साथ उनमें चीज़ों को ठीक से अंजाम न देने की स्थिति आ रही थी (विशेषकर सत्तर के दशक के परिवर्ती समय में), ऐसे में वे बिल्कुल स्पष्ट ढंग से अपनी बात रखते हैं। इससे अपनी भाषा में आती कठोरता को भी वे स्वीकारते हैं। ‘कहानी’ पत्रिका के कला-पक्ष और उसमें जब-तब कला पर होती टिप्पणियों और आलेखों की ओर भी लोगों की नज़र गई। ‘आधुनिक कला कोश’ की भूमिका में विनोद भारद्वाज लिखते हैं, “श्रीपत राय की ‘कहानी’ ने भी आधुनिक कला के प्रति नई जागरूकता पैदा की। उसके आवरण पर आधुनिक कला (पश्चिमी भी) को जगह मिली। छोटी-छोटी सम्पादकीय टिप्पणियाँ भी कला के प्रति पाठक की दिलचस्पी बनाने-बढ़ाने में सहायक हुई। श्रीपत राय स्वयं एक महत्वपूर्ण कलाकार भी और अगर वे कला-लेखन को अधिक समय दे पाते, तो निश्चय ही हिन्दी कला-लेखन और भी समृद्ध होता।” श्रीपत राय ने ‘कहानी’ के अपने सम्पादकीय में ललित कलाओं पर भी कुछ सूक्ष्मता से विचार किया। ‘नन्दलाल बोस की कला साधना’ शीर्षक से लिखा उनका आलेख काफ़ी चर्चित रहा। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली की पत्रिका ‘समकालीन कला’ के नवम्बर, 1983 अंक (अतिथि सम्पादन : प्रयाग शुक्ल) में वह पुनर्प्रकाशित हुआ। ‘कहानी की बात’ में पुस्तक का प्रकाशन (1990) श्रीपतजी के जीते जी हुआ, जिसमें उन्होंने ‘कहानी’ पत्रिका के अपने सम्पादकीय को संकलित किया। ‘कहानी’ पत्रिका को एक समुचित साख मिले, इसके लिए श्रीपतजी ने सालों अनथक मेहनत की। किसी के लिए वहाँ छपना हसरत की बात थी। रमेशचन्द्र शाह ‘आवाहयामि’ में लिखते हैं, “किस क़दर प्रलोभन होता था ‘कहानी’ में छपने का उन दिनों!...” उषा किरण ख़ान अकुंठ भाव से अपनी आत्मकथा ‘दिनांक के बिना’ में स्वीकारती हैं, “मैंने सबसे पहले जो कहानी लिखी ‘आँखें स्निग्ध, तरल और बहुरंगी मन’। वह ‘कहानी’ पत्रिका में श्रीपत राय के यहाँ भेज दी। उनका पत्र शीघ्र ही आ गया। मेरी कामना थी- सभी तत्कालीन लेखकों की भाँति कि पहली कहानी ‘कहानी’ पत्रिका में छपे, सो पूरी हो गई।” इन कुछेक क़िस्सों से हम समझ सकते हैं कि श्रीपतजी ने ‘कहानी’ की स्तरीयता को कैसी ऊँचाई दे रखी थी! ‘देवताओं का ख़ुदा से होगा काम आदमी को आदमी दरकार है।’ -फ़िराक़ गोरखपुरी अगर मैं अपनी बात करूँ तो सारा राय मेरे लिए वह खिड़की हैं, जिससे श्रीपत राय के जीवन-संसार के बड़े-से लैंडस्केप को देखा जा सकता है। उन्होंने जब-तब पूरी ऊष्मा और तटस्थता के साथ अपने पिता को याद किया है। संस्मरण की उनकी किताब ‘Raw Umber’ में श्रीपतजी के व्यक्तित्व की कई तहें खुलती चली जाती हैं। मसलन, वे प्रकृति-प्रेमी थे। वे धुन के पक्के थे। जब उन्हें किसी चीज़ की कोई धुन सवार होती थी, तब वे उसे करके ही मानते थे। इसी कारण उनकी माँ शिवरानी देवी उन्हें ‘धुन्नू’ कहा करती थीं। अपने पिता को लेकर सारा राय ऐसी कई बातें ‘Raw Umber’ में दर्ज करती चलती हैं। श्रीपतजी के लिए ‘धुन्नू’ सम्बोधन ‘प्रेमचन्द घर में’ में एकाधिक जगहों पर आता है। कृष्ण बलदेव वैद अपने एक इंटरव्यू में श्रीपत राय को शिद्दत से याद करते हैं। श्रीपत राय के निधन के बाद दिल्ली में एक शोक सभा का आयोजन हुआ था, जिसमें राम कुमार, नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, कमलेश्वर आदि थे। वैद ने यह बात स्वीकारी कि श्रीपतजी की असाधारण प्रतिभा को पूरी तरह पनपना नसीब नहीं हुआ। श्रीपतजी ने अपनी दो पेंटिंग वैद को दी थी, जो लम्बे समय तक वसन्त कुँज स्थित उनके फ़्लैट में टँगी रहीं। “विष्णु प्रभाकर का कथाकार उन्हें एक ‘अद्भुत चरित्र’ के रूप में मानता रहा, ‘जो सौम्य भी है, शान्त भी है, व्यापारी भी है, और कूटनीतिज्ञ भी।” कमलेश्वर उन्हें ‘साहित्य का धर्मकाँटा’ मानते थे। वे स्पष्ट कहते हैं, “हिन्दी रचना-संसार का इतिहास इलाहाबाद के बिना अधूरा है और इलाहाबाद का इतिहास श्रीपत राय के बिना।” कवि-सम्पादक विष्णुचन्द्र शर्मा ने उनके साथ काम किया है। उनका मानना है, “श्रीपत व्यावसायिक रूप से अल्पव्ययी किन्तु नए लेखकों को स्थापित करने में बहुत उदार और फ़िज़ूलख़र्च थे।” अपने संस्मरण में विष्णुचन्द्र शर्मा सरस्वती प्रेस द्वारा की गई कुछ अनूठी पहलों को भी याद करते हैं, ‘नए-से-नए लेखक को श्रीपत और जगत शंखधर पूरे मन से छापते थे। इसका महत्वपूर्ण उद्धरण है नामवर की पी.एच.डी की थीसिस ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, हिन्दी साहित्य के इतिहास की शायद पहली किताब है जो अपने वायवा से पहले छप गई थी और वह छपी प्रति ही वायवा के हेड को दी गई थी। कपिला वात्स्यायन की थीसिस थी ‘भरत नाट्यम में संगीत’। वह श्रीपत के यहीं से ही आई।” कमलेश्वर अपनी यादनामा ‘आधारशिलाएँ : जो मैंने जिया’ के अध्याय ‘उस व़क़्त नामवर सिंह का जन्म नहीं हुआ था’ में फ़रमाते हैं, “श्रीपतजी रचना और फ़ैशनपरस्त रचना का भेद समझाते थे। विश्व की आधुनिक रचनाशीलता की लगातार जानकारी देते थे, वे सार्थकता के उतने समर्थक नहीं थे जितने कि रचनाशीलता के।” श्रीपत राय को बड़े से हॉल में बैठना पसन्द था। जगह की हो या विचारों की, संकीर्णता को वे पसन्द नहीं करते थे। वे काफ़ी साफ़-सफ़ाई वाले व्यक्ति थे। व्यवस्था-पसन्द। काग़ज़ों के अनावश्यक ढेर को वे स्वयं नष्ट कर दिया करते थे। इससे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ उन्हीं के सामने नष्ट हो गए, जबकि उनके होने पर उस समय को और श्रीपत राय को जानने-समझने के लिए कई सामग्री अपने भौतिक रूप में भी सलामत रह सकती थी। इससे शोधार्थियों और अध्येताओं को सुविधा होती है। भविष्य के किसी मोड़ पर आकर अतीत की किसी व्याख्या से कई नए सन्दर्भ निकलते हैं। जो भी हो, अपने स्वभाव से वे अपना तो शायद नहीं, मगर हिन्दी साहित्य का कुछ नुकसान ज़रूर कर गए। परवर्ती पीढ़ी, अहमद फ़राज़ के शब्दों में उनके लिए यह कह सकती है- ‘सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते-जाते।’ आना-जाना महज़ मनुष्यों के बीच ही नहीं होता, कालों के बीच भी होता है। आने-जाने के बहाने तो होने ही चाहिए। मित्रों, सम्बन्धियों, लेखकों और कलाकारों को लिखे पत्रों में और घर पर छोड़ी गईं, मित्रों को भेंट दी गईं पेंटिंग्स में भी श्रीपत ख़ूब उपस्थित हैं। उन सामग्रियों तक पहुँचकर दरअसल हम श्रीपत राय तक पहुँचते हैं। कोई लेखक-सम्पादक किस तरह अपने परिवार को विस्तृत कर लेता है, इसका एहसास भी तब हमें शिद्दत से आता है। श्रीपतजी ने अपने जीवन में अभाव और भाव दोनों देखे। वे लेखक-चित्रकार के साथ एक मँजे हुए व्यवसायी भी थे। ‘कहानी’ हो या ‘हंस’, उनके सम्पादन में आकर्षक तरीके से उनकी प्रस्तुति की गई। उनकी विशेषताओं को रेखांकित किया गया। उन्होंने अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया और धन भी ख़ूब कमाया। बाद में वे श्लथ हुए और इसे भी कम-से-कम कुछेक को लिखे पत्रों में स्वीकार किया। स्पष्टतः सम्पत्ति से उनका सम्बन्ध, किसी ख़ालिश व्यवसायी की तरह का नहीं था। सारा राय ‘Raw Umber’ में लिखती हैं, “मेरे पिता जिनको आसानी से समझा नहीं जा सकता था, एक बार गर्व, घृणा और अपने को नीचा दिखाने के मिले-जुले भाव से बोले थे कि उन्होंने ‘सात पीढ़ियों’ तक चलने के पैसे कमा लिए हैं। फिर भी, जब वे अपने जीवन के अंत में इलाहाबाद लौटे, तो एक रहस्यमय बीमारी से पीड़ित थे, जिसका कोई भौतिक प्रमाण नहीं था। उनके पास बहुत कम पैसे थे। किसी को पता नहीं चला कि उनकी दौलत का क्या हुआ- उनका धन-संसार हमेशा किसी एकान्त में ही रहा, जिसके उतार-चढ़ाव से कोई परिचित नहीं था। ऐसा लगता था कि उनके दिमाग़ में कुछ चल रहा है और अपने अन्तिम दिनों में वे दोस्तोयेव्स्की जैसे कोई व्यक्ति बन गए थे, जो अपने विचारों से घिरे होते और जिन्हें कोई शान्ति नहीं मिलती थी।” हिन्दी, उर्दू, बाँग्ला, भोजपुरी आदि भाषाओं/बोलियों के जानकार श्रीपत राय को एकाकी जीवन जीना पसन्द था। ‘कहानी’ पत्रिका का अगस्त-अक्तूबर, 1994 अंक श्रीपत राय के निधन के बाद उन पर एकाग्र हुआ था। ‘लमही’ पत्रिका ने अप्रैल–सितम्बर 2018 का संयुक्तांक श्रीपत पर केन्द्रित किया। लखनऊ में आयोजित इसके विमोचन-कार्यक्रम में शेखर जोशी ने स्वीकारा कि किस तरह उनके लेखक के निर्माण में भैरव प्रसाद गुप्त और श्रीपत राय की विशेष भूमिका रही।

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आजकल मार्च 2024

भारतीय ग्रामीण जीवन के यथार्थ को कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करनेवाले कथाकार के रूप में फणीश्वरनाथ रेणु हमारे लिए चिर-परिचित हैं लेकिन एक निबन्धकार के रूप में वे बहुत ही कम चर्चित हुए हैं। रेणु के आठ निबन्ध प्रकाशित हुए हैं। उनकी सम्पूर्ण रचनावली के पाँचवें भाग में संकलित इन निबन्धों की मुख्य धुरी है व्यक्तित्व निर्माण तथा राष्ट्र निर्माण। शिक्षा, साहित्य, कला, राजनीति जैसे सभी तत्त्व इस महान लक्ष्य की पूर्ति के उपकरण मात्र हैं। उनके निबन्धों को पढ़ते हुए हमें ऐसा महसूस होता है कि उनमें अभिव्यक्त सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, साहित्यिक तथा व्यक्तित्व विकास सम्बन्धी जो भी विचार हैं, वे उत्तरोत्तर प्रासंगिक होते आ रहे हैं।व्यक्तित्व : ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं से दो शब्द’, ‘राष्ट्र निर्माण में लेखक का सहयोग’ तथा ‘वह एक कहानी’ ये तीनों निबन्ध...

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