प्रेमचन्द के फ़िल्मी अनुभवों का संसार मुश्किल से एक वर्ष का है। फ़िल्म में जाने का उनका कोई इरादा नहीं था, लेकिन ‘हंस’ और ‘जागरण’ की आर्थिक हानि ने उन पर बम्बई (अब मुम्बई) जाने का दबाव डाला और उन्होंने अपने पत्रों में भी इसे स्वीकार किया कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी ग़लती थी। प्रेमचन्द मुम्बई पहुँचकर अजन्ता सिनेटोन कम्पनी में कहानी-संवाद लेखक का कार्यभार सम्भालते हैं और अपनी पत्नी शिवरानी देवी को पत्र में लिखते हैं, “अभी मैं नहीं कह सकता कि मैं यहाँ रह भी सकूँगा या नहीं। जगह बहुत अच्छी है, साफ़-सुथरी सड़कें, हवादार मकान लेकिन जी नहीं लगता। जैसी कहानियाँ मैं लिखता हूँ उन्हें निभाने के लिए यहाँ कोई ऐक्ट्रेस ही नहीं है। मेरी एक कहानी यहाँ सबको अच्छी लगी लेकिन यहाँ की ऐक्ट्रेसें उसे निभा नहीं सकतीं। उसे निभाने के लिए कोई पढ़ी-लिखी ऐक्ट्रेस रखनी पड़ेगी। मैं तो ऐसी ही कहानियाँ लिखूँगा। इन लोगों की इच्छानुसार तो लिख नहीं सकता।” और उसी दिन जैनेन्द्र को भी लिखा, “पहली को आ गया। मकान ले लिया। यहाँ दुनिया दूसरी है, यहाँ की कसौटी दूसरी है। अभी तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ।” और फिर 24 जून, 1934 को पत्नी को इस सम्बन्ध में अपने विचार लिखे, “यह एक बिलकुल नई दुनिया है। साहित्य से इसका कम सरोकार है। इन्हें तो रोमांचकारी सनसनीख़ेज़ तस्वीरें चाहिए। अपनी व्याप्ति को ख़तरे में डाले बग़ैर मैं जितनी दूर तक डायरेक्टरों की इच्छा पूरी कर सकूँगा, उतनी दूर तक करूँगा, मुझे करना पड़ेगा। ज़िन्दगी में समझौता करना ही पड़ता है। आदर्शवाद महँगी चीज़ है और बाज़-औक़ात उसको दबाना पड़ता है।” प्रेमचन्द की कहानी 'मज़दूर' पर फ़िल्म बनती है, पर सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। अमृत राय ने ‘प्रेमचन्द : कलम का सिपाही’ में ‘मज़दूर’ फ़िल्म की विस्तार से जानकारी दी है। अमृतराय लिखते हैं, “'गोदान' पर काम चल रहा था, मगर चींटी की चाल से। उधर 'मज़दूर' बनना शुरू हो गई थी। जैसाकि ज़ियाउद्दीन बर्नी साहब कहते हैं, जो उन दिनों बम्बई में ही थे और मुंशीजी से अक्सर मिलते रहते थे, और जिसकी तसदीक़ उस फ़िल्म के निर्देशक मोहन भवनानी ने भी की, 'इस फ़िल्म की कहानी का ढाँचा कम्पनी ने तैयार किया था और उस पर चमड़ी-गोश्त मुंशीजी साहब ने मढ़ दिया था।’” यह एक अतिनाटकीय-सी कहानी थी जिसका उद्देश्य यह दर्शाना था कि पूँजीपति उदार और उन्नत विचारों का होकर देश का, जनता का कितना भला कर सकता है! बात थोड़ी-सी मुंशीजी के मन की थी भी और बहुत कुछ नहीं भी थी। बहरहाल ढाँचा तो यहाँ पहले से तैयार ही था, बस गोश्त चढ़ाना बाक़ी था और उसमें मुंशीजी ने कोताही नहीं की। डायलाॅग में जितनी जान डाल सकते थे, डाली, जितनी तेज़ी ला सकते थे, लाए। भवनानी ने भी, जिनकी फ़िल्मी ज़िन्दगी शुरू ही हो रही थी, ख़ूब जी तोड़कर काम किया, एक मिल-मालिक दोस्त की कपड़ा मिल में तस्वीर 'शूट' की गई। बम्बई की फ़िल्मी दुनिया में 'लोकेशन शूटिंग' आज भी कम ही देखने में आती है। रुपये में पन्द्रह आना तस्वीरें आज भी पूरी की पूरी नक़ली सेट बनाकर स्टूडियो में ही बना ली जाती हैं, उस व़क्त तो हिन्दी फ़िल्मों के उस आरम्भिक युग में यह एक बिलकुल नई और अनहोनी बात थी। लिहाज़ा मिल के हज़ारों मज़दूरों समेत वह सीन पर बहुत ही सजीव उतरे, और गो कहानी काफ़ी लचर-सी थी, डायलाॅग ने उसमें काफ़ी जान फूँक दी थी। तस्वीर जब सेंसर बोर्ड के सामने पहुँची तो बम्बई के बड़े पूँजीपति और मिल-ओनर्स एसोसिएशन के सभापति सर जीजीभाई ने, जो बोर्ड के भी सदस्य थे और बहुत प्रभावशाली सदस्य थे, डटकर उसका विरोध किया और फ़िल्म सेंसर बोर्ड से पास नहीं हो सकी। तब भवनानी और अजन्ता सिनेटोन के दूसरे लोगों ने बोर्ड के सभापति और बम्बई के पुलिस कमिश्नर किन्हीं मिस्टर विलसन से अपील की। मिस्टर विलसन ने कुछ दृश्य काट देने के लिए कहा। कम्पनी ने उनकी सलाह पर अमल किया, लेकिन तब भी बम्बई के सेंसर बोर्ड ने, जिसमें बहुत-से बड़े-बड़े पूँजीपति भरे थे, फ़िल्म को पास नहीं किया, लेकिन पंजाब में सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म को पास कर दिया और लाहौर के इम्पीरियल सिनेमा में राम-राम करके उसके दिखाने जाने की बारी आई। बम्बई के सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म को पास नहीं किया, यह बात फैल ही चुकी थी। पहले ही रोज़, भवनानी साहब का कहना है, “साठ हज़ार मज़दूरों की भीड़ सिनेमा के फाटक पर जमा हुई और सात रोज़ तक कुछ इसी तरह का हाल रहा, फाटक पर भीड़ की रोक-थाम के लिए पुलिस और मिलिटरी का बन्दोबस्त करना पड़ा। आख़िरकार पंजाब सरकार ने भी घबराकर उस पर रोक लगा दी।” लाहौर के बाद वह फ़िल्म दिल्ली में रिलीज़ हुई। वहाँ भी अनिष्टकारी ग्रहों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। कोई मज़दूर फ़िल्म के एक सीन की ही तरह, किसी मिल-मालिक की मोटर के आगे लेट गया और एक अच्छा-ख़ासा हँगामा खड़ा हो गया। नतीजा, दिल्ली की प्रान्तीय सरकार ने भी उस पर रोक लगा दी। यू.पी., सी.पी. में जहाँ-तहाँ यह तस्वीर दिखाई गई पर कुछ अरसे के बाद जब अंग्रेज़ी हुकूमत ने उस पर रोक लगा दी तो बात ख़त्म हो गई। बाद को सन् 37 में एक बार फिर उसके मामले को उभारा गया और किसी प्रकार उसके और भी कुछ हिंसात्मक दृश्य काट-छाँट करके उसके ऊपर लगी हुई रोक हटाने का उपाय किया गया लेकिन तब तक लोहा ठंडा पड़ चुका था और लोग दिलचस्पी खो चुके थे, मगर फ़िल्म को दूसरी नज़र से देखने वाले लोग भी थे और उसकी बहुत अच्छी रिव्यू अमरीका की मशहूर पत्रिका 'एशिया' में निकली, लेकिन यह तो ज़रा अभी आगे की बात है। अभी तो तस्वीर बन रही है।” इस फ़िल्म में प्रेमचन्द ने एक-दो मिनट के लिए सरपंच का अभिनय भी किया, बिना मेकअप के और अपनी ही वेशभूषा में। ज़ियाउद्दीन बरनी उन दिनों मुम्बई में ही थे। उन्होंने 'मज़दूर' फ़िल्म के बारे में लिखा है- “13 नवम्बर को मुंशीजी ने हैदराबाद के हुसामउद्दीन ग़ौरी साह्य के एक फ़िल्म-सम्बन्धी लेख पर, जिसमें उन्होंने जन-रुचि के संस्कार के लिए फ़िल्म की उपयोगिता की बात उठाई थी, लेखक को बधाई देते हुए कहा, “मुझे आपके ़ख्याल से लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ इत्तेफ़ाक़ है। मगर जिन हाथों में फ़िल्म की क़िस्मत है वह बदक़िस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। इंडस्ट्री को ‘मज़ाक’ और इसलाह से क्या निस्बत? वह तो एक्सप्लायट करना जानती है और यहाँ इंसान के मुक़द्दसतरीन (पवित्रतम) जज़्बात को एक्सप्लायट कर रही है। बरहना (नग्न) और नीमबरहना (अर्द्ध नग्न) तस्वीरें, क़त्ल-ओ-ख़ून और जन की वारदातें, मार-पीट, ग़ुस्सा और राजव और नफ़्सानियत ही इस इंडस्ट्री के औज़ार हैं और इन्हीं से वह इंसानियत का ख़ून कर रही है।” इसी प्रकार प्रेमचन्द 26 दिसम्बर, 1934 को इन्द्रनाथ मदान को लिखते हैं कि सिनेमा साहित्यिक आदमी के लिए ठीक जगह नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि आर्थिक रूप से स्वतन्त्र हो सकने की कुछ सम्भावनाएँ इसमें दिखाई देती थीं, लेकिन अब मैं देख रहा हूँ कि यह मेरा भ्रम था और अब मैं फिर साहित्य की ओर लौट रहा हूँ। सच तो यह है कि मैंने लिखना कभी बन्द नहीं किया। मैं उसे अपने जीवन का लक्ष्य समझता हूँ।” इसके पन्द्रह रोज़ बाद फिर जैनेन्द्र को पत्र में लिखा, “फ़िल्मी हाल क्या लिखूँ। ‘मिल’ यहाँ पास न हुआ। लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है। मैं जिन इरादों से आया था उनमें एक भी पूरा होता नज़र नहीं आता। ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियाँ बनाते आए हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते। वल्गैरिटी को ये लोग ‘एण्टरटेनमेंट वैल्यू’ कहते हैं। राजा-रानी, उनके मन्त्रियों की नक़ली लड़ाई, यही उनके मुख्य साधन हैं। मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे, लेकिन उनको फ़िल्म करते इन लोगों को सन्देह होता है कि चले या न चले। यह साल तो पूरा करना है ही। क़र्ज़दार हो गया था, क़र्ज़ा पटा दूँगा, मगर और कोई लाभ नहीं। उपन्यास के अन्तिम पृष्ठ लिखने बाक़ी हैं, उधर मन ही नहीं जाता। यहाँ से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर जा बैठूँ। वहाँ धन नहीं है मगर सन्तोष अवश्य है। यहाँ तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूँ।” उन्होंने इन्हीं विचारों के कारण डायरेक्टर हिमांशु राय का उनकी कम्पनी में नौकरी करने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। फ़िल्मी जीवन से उनका मन उचट गया था। जैनेन्द्र ने दिल्ली में 'मज़दूर' फ़िल्म देखी तो प्रेमचन्द से उसकी कमज़ोरियों की शिकायत करते हैं तो वे उत्तर में जैनेन्द्र को लिखते हैं, “‘पगमज़दूर' तुम्हें पसन्द न आया। यह मैं जानता था। मैं इसे अपना कह भी सकता हूँ, नहीं भी कह सकता। इसके बाद एक रोमांस जा रहा है। वह भी मेरा नहीं है। मैं उसमें बहुत थोड़ा-सा हूँ। 'मज़दूर' में भी मैं थोड़ा-सा हूँ, नहीं के बराबर। फ़िल्म में डायरेक्टर सब कुछ है। लेखक क़लम का बादशाह क्यों न हो, यहाँ डायरेक्टर की अमलदारी है और उसके राज्य में उसकी (लेखक की) हुकूमत नहीं चल सकती। हुकूमत माने तभी वह रह सकता है। वह यह कहने का साहस नहीं रखता, मैं जनरुचि को जानता हूँ। इसके विरुद्ध डायरेक्टर ज़ोर से कहता है, मैं जानता हूँ, जनता क्या चाहती है, और हम जनता की इसलाह करने नहीं आए हैं। हमने व्यवसाय खोला है, धन कमाना हमारी ग़रज़ है। जो चीज़ जनता माँगेगी, वह हम देंगे। इसका जवाब यही है- अच्छा साहब, हमारा सलाम लीजिए। हम घर जाते हैं। वहीं मैं कर रहा हूँ। मई के अंत में बन्दा काशी में उपन्यास लिख रहा होगा। और कुछ मुझमें नई कला न सीख सकने की भी सिफ़त है। फ़िल्म में मेरे मन को सन्तोष नहीं मिला। सन्तोष डायरेक्टरों को भी नहीं मिलता, लेकिन वे और कुछ नहीं कर सकते, झख मारकर पड़े हुए हैं। मैं और कुछ कर सकता हूँ, चाहे वह बेगार ही क्यों न हो, इसलिए चला जा रहा हूँ। मैं जो प्लाॅट सोचता हूँ उसमें आदर्शवाद घुस आता है और कहा जाता है उसमें एण्टरटेनमेंट वैल्यू नहीं होता। इसे मैं स्वीकार करता हूँ।... मेरे लिए अपनी वही पुरानी लाइन मज़े की है, जो चाहा लिखा……।” प्रेमचन्द अजन्ता सिनेटोन से अपने अनुबंध से तीन महीने पहले ही मुम्बई छोड़कर चल देते हैं एक कटु अनुभव के साथ कि फ़िल्म बनाना व्यापार है और धन कमाना ही उद्देश्य है। इसके लिए डायरेक्टर जनता की अभिरुचि का नहीं, बल्कि मनोरंजन के नाम पर पवित्र भावनाओं का नहीं, वह अधिक-से-अधिक नग्नता दिखाता है। पश्चिम की सारी बुराइयाँ हमारे अंदर दाख़िल की जा रही हैं और जनता बेबस है। जनता में न संगठन है और न भले-बुरे का विवेक और विज्ञान जैसा ईश्वरीय वरदान भी अयोग्य लोगों के साथ में है, इसलिए प्रेमचन्द इस दायरे से निकलकर अपने बनारस (अब वाराणसी) में जीवन गुज़ारना उचित और उपयुक्त समझते हैं और वे मुम्बई छोड़कर बनारस चले जाते हैं। (प्रेमचन्द का लेख : ‘फ़िल्म और साहित्य’) प्रेमचन्द ने मुम्बई से बनारस लौटकर 'लेखक' में फ़िल्म और साहित्य पर लेख लिखा था। इसकी प्रतिक्रिया हुई और नरोत्तम प्रसाद ने अपनी प्रतिक्रिया ' लेखक' को भेजी और यह पत्र प्रेमचन्द को मिला और उन्होंने 'फ़िल्म और साहित्य' नाम का बड़ा लेख लिखा– प्रेमचन्द जैनेन्द्र के आग्रह पर दिल्ली आते थे और उनके प्रस्ताव पर वे आर्यसमाजी नेता प्रो. इन्द्र तथा जैनेन्द्र के साथ 'शैलबाला' फ़िल्म देखने गए और अपने अनुभव पर यह लेख लिखा जो 'जागरण', 12 अक्तूबर, 1932 को प्रकाशित हुआ। इस प्रकार यह प्रेमचन्द के फ़िल्मी जीवन की संक्षिप्त कहानी है। वे आर्थिक दबाव के कारण अजन्ता सिनेटोन कम्पनी के एक वर्ष के अनुबंध पर मुम्बई जाते हैं और तीन महीने पहले कम्पनी बन्द हो जाने के कारण वाराणसी लौट आते हैं। वे फ़िल्म के लिए कहानी और संवाद लिखते हैं, फ़िल्म में अभिनय करते हैं, हिन्दी फ़िल्मों को देखकर तथा मुम्बई में काम करके फ़िल्म का चरित्र खोलते हैं। फ़िल्म देखते हैं और उसकी आलोचना करते हैं। हिन्दी फ़िल्मों से इतने विविध रूप में प्रेमचन्द जुड़ते हैं और वे इस दृष्टि से अकेले हिन्दी लेखक हैं। span class="">